मोरिंगा भाग 1 पूर्व वृक्षारोपण | Drumstick Section 1 Pre-Plantation

मोरिंगा को सबसे पहले मेक्सिको में लगाया गया था। भारत में, पपीते की विभिन्न किस्मों को आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र राज्यों में उगाया जाता है। सिद्धिविनायक मोरिंगा की व्यापक रूप से खेती की जाती है।

मोरिंगा भाग 2 रोपण के दौरान | Drumstick Section 2 During-Plantation

यहां कैसे और कब रोपना है, इस पर पूरा मार्गदर्शन किया गया है।

मोरिंगा भाग 3 रोपण के बाद | Drumstick Section 3 After-Plantation

यहाँ रोपण के बाद की जाने वाली चीजें हैं| रोपण के बाद अगले दिन ह्युमिक एसिड और फफूंदनाशी लागू करना चाहिए । यह क्रिया अगले दो महीनों के लिए हर पंद्रह दिनों के अंतराल पर की जानी चाहिए। जर्मिनेटर 100 एम एल।, ट्राइकोग्रामा 30 ग्राम एक 15 लीटर पंप में मिलाकर प्रत्येक पौधे के तने को भिगोना। ऐसा कम से कम दो से तीन बार करें।
Part 1.1 | Introduction | प्रस्तावना

परिचय:

मोरिंगा फसल का शास्त्रीय नाम मोरिंगा अलिफ्रा है|  मॉरिंगेशिये मोरिंगा की सबसे आम प्रजातियों में से एक है जो उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय है।| इसकी फलियों को पकाकर खाने के साथ  साथ इसकी पत्तियां और फूल भी बहुत उपयोगी होते हैं

एक कसैले स्वाद के बावजुद मटन के 8 गुना, दूध के 4 गुना कॅल्शि+म से युक्त यह पौधा पौष्टिक तत्वों का राजा है। यह 300 से अधिक विकारों को दूर करने और कुपोषण को रोकने का एकमात्र पौधा है। सिद्धिविनायक मोरींगो की फली आकर्षक दिखती है क्योंकि वह गहरे हरे रंग की होती है और फली का आकार एक समान होता है और उनकी लंबाई लगभग डेढ़ फुट होती है। इस फली मे उच्च मात्रा मे पौष्टिक तत्व होने के कारण यह फली बाजार मे महत्त्वपूर्ण है।

मोरिंगा कम पानी वाली फसल है।मोरिंगा की खेती बडी मात्रा मे मुख्य रूप से दक्षिण भारत मे की जाती है । आज बाजार में उपलब्ध विभिन्न किस्मों से लगभग 200 से 300 फली प्रति पौधा उत्पादन होता है ।

मोरिंगा जुलाई – सितंबर और मार्च – अप्रैल मे दक्षिण भारत से आयात किया जाता है। भारत के अलावा मोरिंगा पाकिस्तान , श्रीलंका, जमैका ,सिंगापुर, क्युबा और मिस्त्र मे उगाया जाता है तमिलनाडु राज्य मे गर्मी के दिनो मे मोरिंगा की बडी आमद होती है।

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